STORYMIRROR

Sangeeta Agarwal

Romance

4  

Sangeeta Agarwal

Romance

शीशा और पत्थर

शीशा और पत्थर

1 min
367

शीशा नाजुक था बहुत

कर ली मोहब्बत पत्थर से,

टूट कर चाहा उसे, उसने

बेखबर रहा पत्थर उससे।


हज़ार टुकड़ों में बिखर गया

शीशा,खून के आंसू रोया।

फिर भी हर टुकड़े में अपने

पत्थर का अक्स ही संजोया।


ये मोहब्बत नहीं तो और क्या है

एक को होती नहीं,एक की जाती नहीं।

इतने पत्थर दिल कैसे होते कुछ लोग

मासूमों की आह कभी खाली जाती नहीं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance