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Devendraa Kumar mishra

Tragedy

4  

Devendraa Kumar mishra

Tragedy

प्रजातंत्र की प्रजा

प्रजातंत्र की प्रजा

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ये है प्रजा 

चुनती है अपना राजा 

देखा इनका अधिकार 

प्रजातंत्र है इस देश में 

आम, गरीब, खास 

सभी प्रकार की प्रजा, हाथ जोड़े आती है इनके द्वार 

जिनको बनना होता है सरकार 

और इसी प्रजातंत्र में राज चुनती प्रजा 

उसके बाद भी राजा तानाशाह हो जाता है 

राजा वसूलता है टैक्स, देता है महंगाई 

बढ़ाता है गरीबी, फैलाता है वैमनस्यता 

भीख मांगती, रोजी तलाशती 

रोटी के लिए दर दर भटकती 

पुलिस से लेकर गुंडों तक की हफ्ता वसूली 

सहती प्रजा. 

ये कैसा प्रजातंत्र है, यहां ऐसा ही प्रजातंत्र है 

प्रजा की आधी उम्र बीत जाती है 

राशन, बिजली, रोजगार, पानी की लाइन में 

कामना पूर्ति के लिए, मंदिर, मस्जिद, तीर्थों, दरगाहों की लाइन में 

बची हुई कोर्ट कचहरी के चक्कर में 

पानी नहीं, बिजली नहीं, रोटी नहीं, रोजगार नहीं, मकान नहीं, दुकान नहीं 

जीने का कोई सामान नहीं 

प्रजा हलकान, परेशान, हैरान 

न जाने कब पुलिस उठाकर थर्ड डिग्री इस्तेमाल कर आपसे न किया अपराध कबूल करवा ले 

न जाने कब कानून के रक्षक यंत्रणा कक्ष में आपका इंकाउंटर कर दें 

भ्रष्टाचार से पीड़ित, लाल फीताशाही से प्रताड़ित, चोर, डकैत अपराधियों से भयभीत 


प्रजा न जाने कब दंगों में मारी जाए 

प्रजा का कोई माई बाप नहीं 

प्रजा का कोई कल नहीं, कोई आज नहीं 

प्रजा अब राजा से फ़रियाद कर भी ले 

तो भी उसकी गुहार नहीं पहुंचती राजा तक 

राजा भारी सुरक्षा के बीच, बुलेट प्रूफ से सुरक्षित, प्रजा के खून पसीने से खुद को पोषित करते हुए हो जाता है बहरा, हृदय हीन 

अब वह सिर्फ देता है आश्वासन और प्रजा वत्सल होने की करता है नौटंकी मात्र 

उसे फिर राजा बनना है सो प्रजा के दुख 

उनकी आत्महत्या, हत्या, फ़साद में राजा का ही हाथ होता है 

प्रजा के पास वोट की ताकत है 

लेकिन प्रजा के हाथ काट दिए जाते हैं 

प्रजा को उसके कर्तव्य याद दिलाए जाते हैं 

और छीन लिए जाते हैं उसके अधिकार 

प्रजा माने शोषण, कुपोषण की शिकार 

राजा और राज्य के रक्षक खून चूसते हैं प्रजा का, बूंद, बूंद निचोड़ता हैं प्रजा का 

प्रजा को फुटबाल की तरह खेलते हैं राजा के दरबारी 

इधर से लात, उधर से लात 

प्रजा क्या कर सकती है 

मात्र धरना, प्रदर्शन 

वो भी शान्ति पूर्वक 

उग्र हुए तो आंसू गैस, लाठी चार्ज, जेल और मौत 

प्रजा के हाथ कुछ नहीं आता सिवाय अपमान, पीड़ा, कष्ट, भुखमरी के 

प्रजा होना अपने आप में एक सजा है 

और पांच वर्ष में एक बार भ्रमित, अनपढ़ जनता का राजा चुनना एक गुनाह 

राजा एक बार हाथ जोड़ता है 

फिर प्रजा की चमड़ी उधेड़ता है 

प्रजा के खून पसीने पर मजा करता है 

राजा ही बनो अब प्रजा नहीं 

या तो राजा चुनने का कोई और तरीका तलाशो या चुनाव करना ही बंद कर दो 

चुनाव करना तुम्हें आता नहीं 

और राजा कोई भी बने 

उसे प्रजा को सताये बिना रहा जाता नहीं 

जब प्रजातंत्र में ही प्रजा का ये हाल है 

तो फिर क्या अर्थ रहा प्रजा होने का 

तुमसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में श्रेष्ठ राजा चुनने को कहा गया है 

तुम चुनते हो, कबीले का सरदार 

किसी आपराधिक गिरोह का सरगना 

किसी पंचायत का मुखिया, किसी मंदिर का महंत 

तुम्हें चुनना नहीं आता 

या तो चुनना सीखो या बंद करो 

कोई दूसरा तरीका ढूंढो 

ये भी सत्य है कि शक्ति जिसे भी मिली सत्ता की 

वो निरंकुश, आतताई, अहंकारी हुआ ही समझो. 



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