STORYMIRROR

Devendraa Kumar mishra

Abstract

4  

Devendraa Kumar mishra

Abstract

प्रजा

प्रजा

1 min
343

प्रजातंत्र जब भीड़ में बदल जाए 

भीड़ में जब भगदड़ मच जाए 

तब प्रजा का तंत्र हिल जाता है 

आदमी का विश्वास उठ जाता है 


और फिर दल, संगठन, गिरोह बन जाते हैं 

चारों खंबे ध्वस्त हो जाते हैं 

कोशिश होनी चाहिए कि भीड़ न बन पाये 

जनता का बहुत तेल न निकाला जाए 

बरदाश्त की एक हद होती है 


इसका ध्यान तंत्र द्वारा रखा जाए 

कंट्रोल नहीं, संतुष्ट करने का भाव रखा जाए 

जाति, धर्म नहीं जनतन्त्र का भाव रखा जाए 

जनता को भीड़ बनने से बचाया जाए 

उनके विश्वास को मजबूत किया जाए 


अन्यथा भीड़ बनी जनता कभी लाल किले पर चढती है 

कभी पूरा शहर जाम करती है 

कभी राजधानी में ट्रैक्टर चलाती है 

ऐसा मौका ही न आने पाए 

अनदेखा मत करो 

तुरंत कोई निर्णय लो 


बहुत देर से लिया गया निर्णय बहुत नुकसान करता है. 

देखने वालों की हिम्मत जवाब दे जाती है 

अच्छा है कि उपाय, समाधान किया जाए 

और प्रजा को भीड़ बनने से बचाया जाए।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract