प्रभु आराधना
प्रभु आराधना
प्रभात वंदन तुम्हे प्रभु है, विनय हमारी कुबूल कीजे।
ज्ञान का सागर बहा दो, बुद्धि शुद्धि सबकी कीजिए।
द्वेष और विद्वेष को भी, दूर सबके मन से कीजिए।
नफरतों की आग को भी, अब शांत सबकी कीजिए।
आज डूबे हैं दुखों में, धरती के मानव सभी।
कर रहे विनती सभी हैं, दुख दूर कर दो तुम अभी।
है अशांति मन में सब के, शांति शीतल कीजिए।
प्यार से मानव रहें सब, प्रेम ऐसा भर दीजिए।
इंसान को इंसान से अब, हो गईं हैं नफरतें।
कीजिए प्रभु काम ऐसा, अा जाएॅ॑ खूब बरकतें।
मानवों के बीच में ही, बन गई हैं दानवों की टोलियाॅ॑।
देह जिंदा से ही अब वो, आज नोचते हैं बोटियाॅ॑।
बन गया मानव पशु है, इंसान फिर से कीजिए।
भाव मानव में दया का, आज फिर भर दीजिए।
हे ! सर्वशक्तिमान ईश्वर, कर रहा मैं विनती यही।
फिर कायम आज हो, धरा में आपसी सद्भाव वहीं।
