नामर्द की निशानी
नामर्द की निशानी
मर्द हूँ मैं,
जो चाहे करूँ
तू औरत है
घर में बैठ
मैं तेरी आजादी
छिना करूँ
तू आँखें नीचे रख
मैं जो चाहे करूँ
इधर मुँह मारूँ
उधर मुँह मारूँ
मैं जहाँ चाहे
वहाँ मुँह मारूँ
तू देखकर भी
अनजान बन
मैं तेरा देव हूँ
घर आऊँ पूजा कर
तू घर में रह
तेरी जेल यही है
घुट, हाँ तू
ऐसे ही घुट
और मर जा
तेरा स्वर्ग यही है
तुझे तेरे माँ-बाप भी
नकारते हैं
तू उनके लिए भी
अनजान है
इस बात का फायदा
मैं उठाता हूँ
आँंखे मूंद कर
विश्वास कर
मर्द हूँ मैं
मेरा सम्मान कर।।
