न सोचा था कभी
न सोचा था कभी
न सोचा था कभी,
एक दिन होगा संसार ऐसा,
कभी था ऐसा नज़ारा जहाँ
विश्वास एक दूसरे पर ख़ुद से था ज़्यादा।
कभी था ऐसा आसमाँ जहाँ देख सकते थे
हुजूम तारों का बहुत ज़्यादा
कभी था ऐसा सागर जिसमें ख़ुद को
निहार सकते थे औरों से ज़्यादा।
कभी था ऐसा धरातल जहाँ गिरे
अगर दाना तो उठा कर खा सकते थे
और भूख मिटा सकते थे
चाहे होती वो जितनी भी ज़्यादा।
कभी था ऐसा रिश्ता जो
भाईचारे से भी था ज़्यादा
और अब, डरता है इन्सान
एक दूसरे से, ख़ुद से भी ज़्यादा।
अब भागता है इन्सान,
अपनों से अपने से भी ज़्यादा
अब सोचता है इन्सान,
क्यूँ वह आगे निकल गया
मुझ से भी ज़्यादा।
और अब रहता है ख़ामोश,
सिमटा, सहमा हुआ सबसे ज़्यादा
अब न वो नज़ारा है, न वो आसमाँ,
न वो सागर, न वो धरातल।
न वो रिश्ता,न वो भाईचारा,
जिनके लिए उसने कभी
न सोचा था इतना ज़्यादा
जिनके लिए उसने कभी
न सोचा था इतना ज़्यादा।
