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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

"ममता शर्मसार,बिगड़े संस्कार"

"ममता शर्मसार,बिगड़े संस्कार"

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फिर से ममता हुई है, शर्मसार झाड़ियों में मिली है नवजात

कितने थे, वे मनुष्य दैत्य, बेकार

एक फूल पर चला दी, तलवार

कहीं जिंदा बच न जाये, यार

गोबर से किया बदन श्रृंगार

हाड़कंपाती सर्दी अत्याचार

फिर कैसे जियेगी, नवजात?

जिसने जन्म लिया, उस संसार

जहां मां ही बन, बैठी, जल्लाद

बदनामी का इतना था, ख्याल

क्यों किया था, फिर गलत प्यार

मासूम की क्या ख़ता थी, यार

जिसकी साँसों का तोड़ा, तार

जिससे पर खाया, इतना खार

जिसे जन्म लेते, छोड़ा मृत्युद्वार

फिर से ममता हुई है, शर्मसार

झाड़ियों में मिली है, नवजात

यह सब बिगड़े हुए है, संस्कार

जो शादी पहले करते है, प्यार

हमे बिगाड़ने में, टीवी कलाकार

साथ मे बॉलीवुड के फिल्मकार

जो देते है, बिगाड़ने के संस्कार

आधुनिकता नाम पर, शादी पहले

मिलने का बढ़ा है, चलन आज

लिविंग टुगेदर की देखो, भरमार

जिससे पैदा होते ऐसे, नवजात

जो शादी पहले के होते है, प्यार

निर्दोष होकर भी पाते है, दुत्कार

अधिंकाश का तो मिटा देते, संसार

झाड़ियों में, गटर में, छिपाते पाप

ऐसों पर चलाओ कानूनी तलवार

जिससे न मारे जाये, फूल नवजात

इसका साखी बस एक ही ईलाज

अपनी संस्कृति से हम करे, प्यार

अपनी संस्कृति, अपने संस्कार

बचाएगी, हम न करे ऐसे दुराचार

हम लोग छोड़ दे, व्यर्थ अहंकार

संस्कृति ही करेगी, सही उपचार

यही बचाएगी नाजायज, नवजात

फिर से न होगी ममता, शर्मसार

गर खुद करे भीतर, गहन विचार

ओर सही दिशा में चलाये, पतवार

फिर न डूबेगी नाव, जाएगी उस पार



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