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Minal Aggarwal

Fantasy

4  

Minal Aggarwal

Fantasy

मेरे मन के आकाश पर

मेरे मन के आकाश पर

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मेरे मन के 

आकाश पर 

आज छा रहे बादल घनघोर 

काली घटायें तैय्यार बैठी 

बरसने को 


छमाछम

चारों दिशाओं में 

हर ओर

मेरे मन के भी 

न जाने 

कितने मौसम हैं जो 

पल पल बदलते रहते 


खामोशी की चादर ओढ़े 

बिना आहट 

बिना शोर 

नजर उठाओ 

सूरज उग जाता 

नजर झुकाओ


सूरज डूब जाता 

पलकों की चिलमन

हटाओ 

मन के आकाश के 

बरसते बादलों का पानी 

आंखों के रास्ते होता हुआ 

दबे पांवों से 


बिना दस्तक दिये 

फिर एकाएक ही 

दिल के अहाते में 

भर जाता।


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