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Archana kochar Sugandha

Tragedy


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Archana kochar Sugandha

Tragedy


मेरे गाँव में एक शहर बस गया है

मेरे गाँव में एक शहर बस गया है

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मेरे गाँव में एक शहर बस गया है

शहरीकरण का नाग सबको डस गया है ।


मासूम, भोले-भाले लोगों पर

चालबाज मगरमच्छ का जबड़ा कस गया है। 


पक्की ईट सीमेंट की परतें चढ़ाकर 

सोंधी मिट्टी की महक पर हँस गया है। 


ऊँची उड़ान के ख्वाब दिखाकर 

छल-कपट का रस भर गया है । 


मेरे गाँव में एक शहर बस गया है 

भाईचारे की मजबूत नस को डस गया है।


नाम को छोड़कर, इसने बदली हर गली-चौपाल

गाँव की हर चाल-ढाल में अब तो यही बस गया है। 


वक्त के बदलते दौर का देकर हवाला 

मेरे गाँव को अपने रंग में, रंग गया है। 


मेरे गाँव में एक शहर बस गया है। 


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