मधुमास
मधुमास
मेरे मन के मधुमास से कैसे सामंजस्य बिठाऊँ
विरह की तपिश से जूझते दिल को शीत सुबह में कैसे मनाऊँ.!
प्रीत की स्निग्ध लौ पर पक रही यादों को रह रहकर दर्द की तीखी कसक से कैसे मिलाऊँ,
तड़ीत सी गिरे तेरी यादों की रिमझिम, पुरवाई पुकारे मैं कैसे गाऊँ.!
आँसूओं के गीले आँचल में एक मधुर सम्बल तेरे इंतज़ार का बिखेरे पड़ा है,
उस उम्मीद की धूप को नैराश्य के भावों में कैसे छुपाऊँ.!
नैंन नीराभिषेक करे स्वप्न फूल पल-पल बिखरे उर की दृग दहलीज़ पर यादों का आक्रंद पड़ा,
प्रीत सभर तेरी सारी बातें भला कैसे भूलाऊँ.!
आहटहीन राह पर एक ही झँकार गूँजती है तेरे कदमों की जिसे साँसों में ठहरा चुकी हूँ
सराबोर, उस रव से दूर कहो कैसे जाऊँ.!
आकर बता जा क्या प्यास के मरु में ही कटेगा मधुमास का मौसम
कहो तो भूलने को भूल भी जाऊँ पर तुम्हारी जगह पर किसी और को कैसे बिठाऊँ।।

