STORYMIRROR

Kanchan Prabha

Abstract Fantasy

4  

Kanchan Prabha

Abstract Fantasy

मैं एक राज बनूँ

मैं एक राज बनूँ

1 min
214

तेज आँधी जब चले

मैं रुख तो नहीं बदल सकती

बस किसी पँछी की तरह

मैं परिंदों की परवाज बनूँ


पर काटने वाले भी

लाखों मिल जायेंगे हर मोड़ पर 

बस कल की नई सुबह के लिये

किसी पपीहे की आवाज बनूँ


मेरी आवाज को दबा कर

सैकड़ों आगे बढ़ेंगे राहों में 

बस उन लोगों की सोच के लिये

मैं एक सुन्दर साज बनूँ


बैठे है कितने कितने शायर

करने को जग की तारीफ

मैं अपनी ही कविता में छुपकर

खुद अपनी ही अंदाज बनूँ


चलते चलते मंजिल तक मैं 

पर्वत के उस पार बढूं

तिरंगे की उस तीन रंग में 

मैं भी चक्र सा ताज बनूँ


जलते जलते शबनम की बुंदे

गिरने लगे जब धरती पर 

उससे जो लोग रौशन हुये

उन सबके लिये मैं नाज बनूँ


बात अगर बुझने की आये

सांस छुपा लूँ सीने में 

मन के किसी कोने में फिर

मैं खुद के लिये एक राज बनूँ



రచనకు రేటింగ్ ఇవ్వండి
లాగిన్

Similar hindi poem from Abstract