क्या कमी थी
क्या कमी थी
तू यक़ीन कर या ना कर
पर यक़ीन है मुझे
तेरी मुस्कान में अब वह बात नहीं
तेरी खामोशियाँ भी जाने क्यों
अखरती हैं तुझसे नजरें मिलाकर
तेरा रूठना तेरा ख़फ़ा होना भी
चुभते हैं आंखों में
जैसे मरुस्थल में कांटे कैक्टस के
सच में अगर उतना ही चाहती है आज भी
जितना चाहा था कभी तो
पूछती ज़रूर कि ये उदासी
ये मायूसी क्यों छाई है इस रिश्ते में
ये दूरियाँ ये फासले क्यों बढ़ रहे हैं
हमारे बीच वक़्त की रफ्तार से पहले
मैं तो कल भी वही था जो आज हूँ
कुछ भी तो नहीं बदला
बदला है तो सिर्फ़ तेरा अंदाज
तेरी हंसी, तेरे चेहरे की लकीरें
दिन वह भी था जब मेरी इक पुकार से
दौड़ी चली आती थी मेरी बांहों में
कहाँ खो गए तेरे वह जज़्बात
पिघल जाते थे जो मेरी यादों में
तू कुछ मत कहना
क्योंकि मैं पढ़ चुका हूँ
इन आंखों की दबी दबी-सी भाषा
तूने इतना भी मुनासिब नहीं समझा कि
रास्ते बदलने से पहले
सिर्फ एक बार बताया होता मुझे भी
तो इतना वक़्त तो मिल जाता कि
तेरी तस्वीर को लौटाकर तुझे
खुद को सम्भाल पाता मैं
क्या कमी थी मुझमें कभी बताया नहीं
मगर इतना तो ज़रूर याद रखना
कमी तो उस राह में भी होगी
जिधर तू अब चल पड़ी है।

