कुर्सी
कुर्सी
न जाने इंसान की सीरत क्यों बदली भगवान,
कुर्सी के लिए, वो तो बन गया हैवान।
रूप न बदला, रंग ही बदला, जैसे गिरगिट शैतान,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान।
काहे कुर्सी की ये ममता, उमड़ पड़ी भगवान,
भाई को भूला, बहन भी भूला, भूला माँ, बाप से भगवान,
स्वार्थ ने जकड़ा, नफरत ने पकड़ा, ये कैसा इंसान,
कुर्सी के लिए तो देखो, बन गया हैवान, कितना बदल गया इंसान।
न कोई शिक्षा, न दी भिक्षा, किया गुरु का अपमान।
एक कुर्सी पाने की खातिर, बन गया हैवान,
रिश्ते तोड़े, नाते तोड़े, किया कुर्सी का सम्मान,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान।
संस्कारों को छोड़ा, पैसे से खेला, मारा खुद का इंसान,
पाने कुर्सी, बनने को नेता, बना बड़ा हैवान।
गिरते गिरते बना ये नेता, कितना बड़ा शैतान।
बस कुर्सी की ही खातिर, बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान।
