STORYMIRROR

Praveen Kumar Saini "Shiv"

Tragedy

4  

Praveen Kumar Saini "Shiv"

Tragedy

इंसान भाग रहा

इंसान भाग रहा

1 min
290

आज निकला मै घर से देख

नजारा बाहर का हंस दिया

हर कोई दोड़ रहा था जाने

कंहा जाने की होड़ थी कि सुकून खो दिया

रात दिन भाग रहा इंसान

पैसे कमाने जाग रहा इंसान

रिश्ते भूल कर लोभी हो रहा इंसान

मानवता नजर ना आती

आत्मा को भरे बाजार बेच रहा इंसान

औरत जिस्म बेच रही ले नाम मजबूरी का

मर्द ईमान बेच रहा ले कर नाम जिम्मेदारी का

हर कोई कुछ बेच रहा देख देख कर मैं रो दिया

वाह रे इंसान पैसा खूब कमा लिया

चैन सुकून पर तुमने खो दिया

पिता को पुत्र से बात करने की फुर्सत नही

माता को पिता के आने जाने की खबर नही

बेटी कहां किस के साथ सो रही

बेटा जाने किस का कर रहा चीर हरण

रिश्ते लगा दिये दांव पर सब कुछ खो दिया

इंसान मूर्ख बन अमीर हो रहा

पैसे के नीचे दब कर सब कुछ इंसान ने खो दिया। ‌


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy