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manisha sinha

Tragedy

4.7  

manisha sinha

Tragedy

क्योंकि वो काली रात, अब मेरे साथ रहती है

क्योंकि वो काली रात, अब मेरे साथ रहती है

2 mins
231


बहुत सी ख्वाहिशें,बहुत से सपनें थे।

सवालों की कश्मकश थी, मगर इरादे भी पक्के थे।

सुना ही था जिन, क़िस्सों-कहानियों को

उन्हें अब हक़ीक़त में भी तो जीने थे।


पहाड़ों के शिखर पर दौड़ कर जाना था।

समुन्दर के लहरों को, एक बार तो ललकारना था।

इन्द्रधनुष से कुछ रंगें चुराकर,

पूरे आसमान को उस जैसा बनाना था।


पर अब तो ये बातें,बेमानी सी लगती हैं।

ना आँखें बंद होती हैं, ना पलकें ही झपकती हैं।

अँधेरों में छुपती हूँ, दिन के उजाले से डरती हूँ।

हक़ीक़त भी मुझको अब, सपनों सी लगती है।

क्योंकि वो काली रात, अब मेरे साथ रहती है।


अपने और पराए में कोई फ़र्क़ नहीं था।

किसी के मनसूबों पर भी, कोई शक नहीं था।

बस अपनें ख़्वाबों को जीने की चाह लिए,

इरादों में पक्की,कुछ कर गुजरना था।

मगर वो रात क्या आई ,सब बदल गया है।


जज़्बों ,इरादों को चकनाचूर कर गया है।

ये रंग -बिरंगी दुनिया मुझे, बेरंग सी लगती है।

क्योंकि वो काली रात, अब मेरे साथ रहती है।


माँ बाप की दुलारी थी, सबकी तो प्यारी थी।

प्यार भरे थपकी की, बस मुझको आदत थी।

पर वह किसी का छुना इस कदर,झकझोर सा गया है।

अपनों के स्पर्श को भी भूला गया है।

खिलखिलाता था चेहरा ,जो हर छोटी बातों पर

जाने वो मुस्कान,कहाँ गुम हो गया है।


चेहरे को अपने दुपट्टे से ढकती हूँ।

किसी से दो बातें ,करते हुए हिचकती हूँ।

जितना मिटाती हूँ उन यादों को मन से,

शक्ल उनकी आँखों में उतनी ही उभरती है।

क्योंकि वो काली रात, अब मेरे साथ रहती है।


जाने वो कौन थे, इंसान तो नहीं थे।

जानवर भी कह सकती नहीं,क्योंकि 

वो जिस्म के इस कदर तो प्यासे होते नहीं।

हमारे तुम्हारे जैसे ही थे,पर रूह नहीं थी उनमें।

जिंदे लाशों के जैसे थे वो शायद !


तभी तो मेरा चीखना उनके,कानों को ना भेद सका।

छटपटाना मेरा ना उनके, मन को ही तड़पा सका।

नग्न मेरे जिस्मों को देख, उनकी आँखें ना सकुचाती थीं।

पर मेरी आँखें वो मंजर,अबतक भूल ना पाती है।

ख़्वाबों के संग मिलकर मुझको ,ये हर रोज़ डराती है।

क्योंकि वो काली रात, अब मेरे साथ रहती है।


पर ठाना है अब मैंने भी, नई यादों के अँकुर बोने हैं।

फिर से सपनों को अपनें, सतरंगी रंगों में जो रंगने हैं।

नहीं इजाज़त दूँगी अब मैं, बीते कल को खुद पर होने हावी।

हर सवाल पर अब मुझको, सिंह सा दहाड़ लगाना है।

उस काली अँधेरी रातों से ,उजाला छीनकर लाना है।

उस काली अँधेरी रातों से, उजाला छीनकर लाना है।


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