करुण क्रंदन
करुण क्रंदन
अब सुनाई दे रहा
बस करुण कन्दन
नफरतों से है भरा
अब ये जमाना।
आ रही है अब दिलों से
वेदना से संग रुदन
उठ रहे चीत्कार
छाया है सियापा।
खो रहे कैसे यहाँ हैं
लोग आपा
हो गयी कैसी
मतलबी है ये दुनिया।
देखकर होता द्रवित
है ये मेरा मन
आज सबका है
गला रुंधा हुआ।
उठ रही है मन में
बस ये वेदना
क्रांति का इक दौर
फिर आये यहाँ।
होगी तभी जनजन में
फिर नव चेतना
स्वार्थ से है घिर गया
अपना ये जीवन।
है दुखों की राह वो जिसको
कहे सच्चा है ये धन
हो गया कैसा है
ये बैरी जमाना।
होने लगा है शत्रुवत
व्यवहार अब
जी रहे इक्कीसवी है
हम सदी में।
खो रहे कैसे यहाँ
संस्कार अब
बस मेरा कहना
शिवम् तुमसे यहाँ।
फूले फले यूं ही
सदा प्यारा चमन !
