ख़्यालों के दायरे
ख़्यालों के दायरे
कभी तुमने यह सोचा है कि
मेरे सारे ख़्यालों के दायरे सिर्फ़
तुम्हारे आस पास सिमट कर क्यों रह गए हैं?
तुम गुज़र गए मेरे सामने से और
मेरी दोनों आँखों के ये पैमाने अब
तुम्हें यूं अपने सामने देखकर क्यों बह गए हैं?
काश तुम कभी महसूस कर पातीं
जुदाई के दर्द का अहसास और ख़ामोशी
क्या मेरे ख़ामोश अहसास तुमसे कुछ कह गए हैं?
मैंने अपने दर्द और अकेलेपन को
दुनिया की रुसवाई से हमेशा बचाया
अब तुमसे क्या कहूं, कितना ये मासूम सह गए हैं?
काश तुम कभी यह समझ पातीं...
तो तुम मुझसे मिलने ज़रूर आतीं...
काश तुम मेरी ज़िंदगी में न आतीं...

