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मिली साहा

Tragedy

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मिली साहा

Tragedy

कहां आ गए हम

कहां आ गए हम

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एक के बाद एक कड़े इम्तिहान इस जिंदगी के होते गए,

मुड़ कर देखने का समय ना था, हम भी आगे बढ़ते गए,


मंजिल की तलाश में अनजान रास्तों पर भटकते-भटकते,

अपने शहर, अपनी गलियों और अपनों से हम दूर होते गए,


एक आसमान एक ही जमीं के नीचे होकर भी दूर थे हम,

कोई गुंजाइश नहीं थी लौटने की, दूरियों को हम सहते गए,


कारवां लेकर चले थे, और रह गए तन्हा मुसाफ़िर बनकर,

पीछे छूटी यादों को मुट्ठी में बंद कर अकेलेपन से लड़ते गए,


हर खुशी, हर मुस्कुराहट छोड़ कर बस होड़ थी दौड़ने की,

ख्वाहिशों की मंजिल पाने के जुनून में हम बस दौड़ते गए,


सपनों को पूरा कर लौट आएंगे हम फिर अपनी जमीं पर,

ख्वाबों का आसमान क्या मिला हम वहीं खुद को खोते गए,


आसमान की ऊंचाई पर बढ़ते-बढ़ते जमीं धुंधली होती गई,

कामयाबी की चकाचौंध में ऐसे फंसे की जमीं को भूलते गए,


याद ही ना रहा कि अपनों से किया था वादा लौट आने का,

दिल से बने रिश्तों को भूलकर हम कांच के रिश्ते बनाते गए,


कहां से चले थे और कहां आ गए हम इस बनावटी दुनिया में,

महकते फूलों का उपवन छोड़ कागज़ के फूल समेटते गए,


सब कुछ हो कर भी कुछ नहीं है भीड़ में भी अकेले हैं हम,

क्यों अपनों को छोड़कर अपने ही निशान हम मिटाते गए,


छोड़कर ये आसमान हमने जब भी कदम बढ़ाया लौटने को,

अपनों की ओर ले जाने वाले रास्ते जाने क्यों लंबे होते गए।


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