STORYMIRROR

Rajeshwar Mandal

Tragedy

4  

Rajeshwar Mandal

Tragedy

जन्नत

जन्नत

2 mins
441

मारकीन कपड़े जैसी पतली साड़ी

फटी ब्लाउज पहन रखी थी 

जेठ दुपहरी में 

धूप से बचने के ख़ातिर 

माथे पर सूप ले रखी थी

रुग्ण काया बिन चप्पल पांव 

अश्रु पूरित नेत्रों से ताक रही थी 

हर एक आने जाने वाले बस को 

बेसब्री से झांक रही थी ।

आँचल में कुछ मुढ़ी थी 

और लोटा में पानी लायी थी 

बच्चे को भूख लग गयी होगी

शायद यही सोच खाने को लायी थी। 


बड़ी लार-प्यार से पाली पोसी

दाई का काम कर उसे पढ़ाई थी

कहीं कदम न बहके इसका इसलिए 

नीति की भी पाठ पढ़ाई थी 

पिछले ही महीने मिली है नौकरी 

आज पहली तनख्वाह लेकर 

बेटा को घर आना था 

साहब को मिली थी सरकारी गाड़ी 

तो फिर बस से कहाँ आना था ।


जैसे ही चौराहे पर कार लगी 

अंग रक्षक ने उसे घेर ली

दृश्य देख माँ का जी घबराया

हो हतप्रद वो चिल्ला उठी

सोच अनहोनी की आशंका 

हाँफते-काँपते माँ 

सुरक्षा घेरे में जा घुसी

दोनों हाथ जोड़ अंग रक्षक से 

बेटे को छोड़ देने की 

मिन्नत करने लगी


देख माजरा 

बेटा सब कुछ समझ गया 

तुरंत अंग रक्षक को 

मुख्यालय वापस किया 

चैन की साँस ली माँ ने 

भास्कर को प्रणाम की

लाल के माथे आँचल रख

घर की ओर पैदल ही प्रस्थान की ।

कूल देवता की पूजा कर 

बेटे को सबसे पहले खाना दी 

फिर इधर उधर की बात कर

नैतिकता की कुछ सीख दी। 


टुटी खाट पर माँ बैठी है 

बेटा बैठा है कदमों में 

खुशी की आँसू है माँ की नेत्रों में 

बेटे की आँखें भी कुछ नम है 

देख अपनी अनुपम कृति 

खुदा भी दिल खोल मुस्काया है 

माँ की चरणों में ही जन्नत है 

खुदा ने आज फिर से हमें समझाया है।। 



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy