अनजान पथिक
अनजान पथिक
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सुनहरे ख्वाब देखते देखते
न जाने कब मैं बड़ा हुआ
सपने पूरे होने के दिन में
कब गर्त में फिसल गिरा
उमड़ते घुमड़ते है कई सवाल मेरे
कहां चूक हुई कहां मुड़ जाना था
मै गलत या राह ग़लत था
नसीब दोष या वक्त ही बेगाना था
उलझन सुलझन में कोई फर्क नहीं
अनजान पथिक मैं दिशाहीन पथ का
रोज खोजता हूं अब भी उस मंजिल को
जो मंजिल पास से गुज़र गया
एक सांत्वना देता हूं तब ख़ुद को
शायद मैं ही अनजान पथिक था
ये भी सिर्फ दिल बहलाने की बात प्रिय
कहां स्वीकार करता मन ये बात मेरे
अब तो खुद की घाव को खुद ही
नित रोज मलहम लगाता हूं
जिस पथ पर पग फिसला था
बारंबार उसी पथ को देखने जाता हूं
जब थक कर अक्सर मैं सो जाता हूं
तब अपने कई हाल पूछने आते है
चूक हुई कहां किस पथ पर तुझसे
दुखती रग का फिर से नस दबाते है
जब चलना ही है बिना रहवर
फिर गुंजाइश कहां
राजेश्वर किसी के सहारे का
चलता चल फिर मदमस्त चाल में
निर्बाध उसी अनजान पथ पर
जिस पथ पर पग फिसला था ।
