STORYMIRROR

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"

Abstract Inspirational

3  

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"

Abstract Inspirational

ज़िंदगी का दस्तूर

ज़िंदगी का दस्तूर

1 min
266

ज़िंदगी का बस यही दस्तूर है

हर ख़ुशी होती यहां क़ाफ़ूर है


शान में अपनी रहे डूबा सदा

लोग कहते हैं बड़ा मगरूर है 


जो नहीं लेता बुज़ुर्गों की दुआ

क़ामयाबी से हमेशा दूर है


हसरतों का कारवां पलता अगर

तीरगी मिलती वहां भरपूर है


मौसमी मंज़र हसीं जिसको मिले

मान इज़्ज़त के नशे में चूर है


सोचते थे मैं बड़ा बलवान हूं

वक्त ने उनको किया बेनूर है


बात ये ख़ुद को बताओ हर घड़ी

ऐ मुसाफ़िर तू नहीं मजबूर है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract