STORYMIRROR

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"

Abstract

3  

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"

Abstract

बंदगी

बंदगी

1 min
303

हर तरफ़ जब बंदगी होने लगी

ज़िंदगानी में खुशी होने लगी


इस जगत में सब मयस्सर है मगर 

आदमी की बस कमी होने लगी


खौफ़ दिल का उड़ गया जाने कहां 

मौत से जब दिल्लगी होने लगी


जिसको छोटा थे रहे हम मानते 

बात देखो वह बड़ी होने लगी 


देख कर गंदी सियासत आज-कल 

अब मुसाफ़िर बेकली होने लगी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract