जी सकते हो क्या तुम
जी सकते हो क्या तुम
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
जब गुजरे
हर पल एक
खौफ के साये में !
आंखों में
ख्वाबों की जगह
एक डर लेकर !
कानों में घुलते
प्यार के मीठे बोल
की जगह
गूंजती अपनी ही
सिसकियों को सुनकर !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
जब महसूस हो
एक अनचाही छुअन
अपने बदन पर !
काली अंधेरी रातों में
नजर आए जब
एक खौफनाक साया !
एक परछाई
जो आतुर खड़ी हो
डंसने को
हैवानियत से तुम्हें
ग्रसने को !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
जब बीत जाए
हर रात
खुद की ही निगरानी में !
खुल जाए
एक झटके में आंखें
फैल जाए जब
पुतलियां
उसी अनचाहे डर से !
डराए जब
खुद की ही धड़कने
बनकर आहटें !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
सिमट जाओ जब
डरकर
खुद में ही !
तिलमिला जाओ जब
तन से
ज्यादा मन के
घावों से !
देखो सभी को
शक भरी निगाहों से !
उठने लगे जब
विश्वास
खून के भी नातों से !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
जब कैद रखो
खुद को
एक बन्द कमरे में !
महफूज
ना लगे जब
अपने ही घर में !
हो जाओ तरबतर
पसीने में
डरकर अपने ही
साये से !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
जब नजर आए
हर शख्स में
छिपा एक हवस का
पुजारी !
भयभीत रहो
जब उस निगाह से भी
जो देखती है तुम्हें
प्यार से !
डरते हो उन हाथों से
जो उठते है
आशीर्वाद में !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
जो हो इतनी बेरहम
जीना पड़े जब
हर सांस
के साथ घुटकर !
तिल तिल
हर रोज मरकर !
आंसुओं
के घूंट पीकर !
खुद से
रोज एक जंग लड़कर !
जी सकते हो क्या तुम
एक ऐसी जिंदगी ?
लेकर गहरे
घावों को जिनका
मरहम
वक्त के पास भी ना हो !
हर रोज
चोट पहुंचाए
जो आत्म सम्मान को !
छीनकर खुशियां
कर दे जो
तबाह जिंदगी को !
हां, जीती हूं मैं
एक ऐसी जिंदगी !
क्योंकि मैं
सहनशीलता की
मूरत हूं !
दर्द में भी
मुस्कुराना
बखूबी जानती हूं !
रोती हूं बहुत
मगर
खुद को संभालना
भी जानती हूं !
