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Navya Agrawal

Tragedy Inspirational

4  

Navya Agrawal

Tragedy Inspirational

जी सकते हो क्या तुम

जी सकते हो क्या तुम

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जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?

जब गुजरे

हर पल एक

खौफ के साये में !

आंखों में

ख्वाबों की जगह

एक डर लेकर !

कानों में घुलते

प्यार के मीठे बोल

की जगह

गूंजती अपनी ही

सिसकियों को सुनकर !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?


जब महसूस हो

एक अनचाही छुअन

अपने बदन पर !

काली अंधेरी रातों में

नजर आए जब

एक खौफनाक साया !

एक परछाई

जो आतुर खड़ी हो

डंसने को

हैवानियत से तुम्हें

ग्रसने को !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?


जब बीत जाए

हर रात

खुद की ही निगरानी में !

खुल जाए

एक झटके में आंखें

फैल जाए जब

पुतलियां

उसी अनचाहे डर से !

डराए जब

खुद की ही धड़कने

बनकर आहटें !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?

सिमट जाओ जब

डरकर

खुद में ही !

तिलमिला जाओ जब

तन से

ज्यादा मन के

घावों से !

देखो सभी को

शक भरी निगाहों से !

उठने लगे जब

विश्वास

खून के भी नातों से !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?


जब कैद रखो

खुद को

एक बन्द कमरे में !

महफूज

ना लगे जब

अपने ही घर में !

हो जाओ तरबतर

पसीने में

डरकर अपने ही

साये से !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?

जब नजर आए

हर शख्स में

छिपा एक हवस का

पुजारी !

भयभीत रहो

जब उस निगाह से भी

जो देखती है तुम्हें

प्यार से !

डरते हो उन हाथों से

जो उठते है

आशीर्वाद में !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?


जो हो इतनी बेरहम

जीना पड़े जब

हर सांस

के साथ घुटकर !

तिल तिल

हर रोज मरकर !

आंसुओं

के घूंट पीकर !

खुद से

रोज एक जंग लड़कर !

जी सकते हो क्या तुम

एक ऐसी जिंदगी ?

लेकर गहरे

घावों को जिनका

मरहम

वक्त के पास भी ना हो !

हर रोज

चोट पहुंचाए

जो आत्म सम्मान को !

छीनकर खुशियां

कर दे जो

तबाह जिंदगी को !


हां, जीती हूं मैं

एक ऐसी जिंदगी !

क्योंकि मैं

सहनशीलता की

मूरत हूं !

दर्द में भी

मुस्कुराना

बखूबी जानती हूं !

रोती हूं बहुत

मगर

खुद को संभालना

भी जानती हूं !



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