STORYMIRROR

जा कहे कू-ए-यार में कोई

जा कहे कू-ए-यार में कोई

1 min
301


जा कहे कू-ए-यार में कोई

मर गया इंतिज़ार में कोई।


छोड़ सौ काम आ पहुँच साक़ी

जाँ-ब-लब है ख़ुमार में कोई।


वो भी क्या रात थी कि सोता था

सर रखे उस किनार में कोई।


मत गुज़र ख़ाक पर शहीदों की

चैन ले टुक मज़ार में कोई।


क्यूँ ‘बयाँ’ सैर-ए-बाग़ की रुख़्सत

नहीं देता बहार में कोई।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama