STORYMIRROR

कहा अग़्यार का हक़ में मेरे

कहा अग़्यार का हक़ में मेरे

1 min
737


कहा अग़्यार का हक़ में मेरे मंज़ूर मत कीजो

मुझे नज़दीक से अपने कभू तो दूर मत कीजो


हुए संग-ए-जफ़ा से शीशा-ए-दिल के कई टुकड़े

बस अब इस से ज़्यादा और चकनाचूर मत कीजो


मेरे मरहम-गुज़ार उस शोख़-ए-बे-परवा से ये कहियो

कि ज़ालिम ज़ख़्म ताज़ा है उसे नासूर मत कीजो


हिक़ारत अपने आशिक़ की नहीं माशूक़ को भाती

'बयाँ' सई अपनी रुसवाई में ता मक़दूर मत कीजो


कहा था सार-बाँ के कान में लैला ने आहिस्ता

कि मजनूँ की ख़राबी का कहीं मज़कूर मत कीजो


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन