STORYMIRROR

Kanchan Prabha

Fantasy

3  

Kanchan Prabha

Fantasy

इंतजार

इंतजार

1 min
341

परुष सा यह दिन रात

और लम्हें गुजर गये

विरावविहीन मुख

प्रशवसित सी रह गयी 

कई कौमुदी निशा भी

गुजर गई

वातायन में खड़ी खड़ी 

गुजार दी थी मैंने  

कई वत्सर 

आज किसी परिमल के लहर 

गुजरे तो लगा 

मेेरी इस कविता की

परिभाषा पूर्ण हुई

और मैं उस गुजरते हुये

पथिक के पाश में 

बँँध कर आज

गन्तव्य पा लिया 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Fantasy