STORYMIRROR

Sarita Kumar

Fantasy

4  

Sarita Kumar

Fantasy

हिस्सा

हिस्सा

1 min
424

अपने हिस्से का 

सारा प्रेम 

पा चुकी हूं मैं 

दुनिया के 

तमाम रिश्तों 

का मान 

मिला है मुझे 

बंजर जमीं 

से भी मिली है नमी 

पत्थरों ने भी दिया है 

प्यार बेशुमार 

पूजती हूं हर रोज शालिग्राम 

जब कभी 

अपनी गरीबी का 

एहसास होता है 

छू कर आती हूं 

पारस को 

बन जाती हूं कुंदन 

थकने लगती हूं 

तब पारिजात 

के नीचे सुस्ता लेती हूं 

फिर से ऊर्जावान होकर 

चल पड़ती हूं 

उस सफ़र पर 

जहां से 

लौटना नहीं होगा 

अपनी मंजिल पर ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Fantasy