STORYMIRROR

Kishan Negi

Tragedy Inspirational Thriller

4  

Kishan Negi

Tragedy Inspirational Thriller

हां, मैं एक मजदूर हूं

हां, मैं एक मजदूर हूं

1 min
384

भूख को सुलाने के लिए रात भर जागता हूँ 

पेट पर बाँध कपड़ा सुबह घर से भागता हूँ 

काम की तलाश में हर सड़क नाप डाली है 

कोशिश आज भी जारी है, मैं इक मज़दूर हूँ 


हथौड़ी छैनी लेकर धूप में हर पल नहाता हूँ

मेहनत की चादर ओढ़कर पसीना बहाता हूँ

आलीशान भवन जो खड़े हैं, मेरी ही रचना है

क्या तक़दीर है सड़क पर सोने को मज़बूर हूँ


मुफ़लिसी के पैबंदों तले ज़िन्दगी सिमट गई है 

थकान भी हारकर आज मुझसे लिपट गई है 

दुनिया का बोझ ढोते-ढोते कंधे झुकने लगे हैं 

रक्त-रंजित पांवों से मगर मैं चलता ज़रूर हूँ


घर में मुरझाए चेहरे अक्सर परेशान करते हैं

भूखे पेट जब सोते हैं तो बहुत हैरान करते हैं

उम्मीद अभी ज़िंदा है मेरा घर भी रोशन होगा

सुनता कोई नहीं मगर संसद में गूँजता ज़रूर हूँ


सपनों की बुनियाद तो अर्थ-तंत्र का पैमाना हूँ 

किस्सा बनकर रह गया जैसे गुजरा ज़माना हूँ 

हसरतों की पोटली लेकर मारा-मारा फिरता हूँ 

जिसकी ये पटकथा है हाँ वहीं लाचार मज़दूर हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy