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Surjeet Kumar

Abstract Tragedy Others

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Surjeet Kumar

Abstract Tragedy Others

एक गगरी

एक गगरी

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एक गगरी भरी जो आधी थी समझती थी

खुद को विद्वान वो नादान

ना समझ पाई थी

दूसरों का मान

जानती वो सबको थी

पहचानती जो सबको थी

भूल गई थी कुछ वो

पहचानना स्वयं को

भूल गई थी भूल से

भरना बहुत है बाकी

ज्ञान के अनमोल मोतियों को

जिस की माला कभी पूरी ना होती

वो माला जिसे चाहिए थे अनगिनत मोती

वो माला जिसे चाहिए थी कच्ची डोर

डोर जो पिरोए मोतियों को

संजोए समाज को

बनाए रखे जो आत्मविश्वास को

मान जो ना घटे कभी

बना सकती थी डोर

उसी डोर और मोतियों को

लेना भूल गई थी गगरी

बस फिर क्या था

चारों तरफ बिखेर पड़े थे

चकाचौंध कर देने वाले सुंदर मोती

अब रह गई थी गगरी अकेली

सिसकियाँ भरती ओर रोती

एक गगरी भारी जो आधी थी समझती थी

खुद को विद्वान वो नादान


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