STORYMIRROR

Sheetal Jain

Abstract

4  

Sheetal Jain

Abstract

अवशेष

अवशेष

1 min
322

खेलने की उम्र में

पहनाकर पायल और चूड़ियाँ 

सिखा रहे मुझे नृत्य

नहीं मेरी इच्छाओं का मूल्य 

बेबस देख रहीं सहेलियाँ।

 

मन क्या मेरा नहीं होता 

आकाश के नीचे स्वच्छंद घुमूँ 

विविध विविध खेल खेलूँ 

 सुंदर सी घाघरा चोली पहन

सहेलियों संग आम तोड़ूँ।


माँ बाबा ने न कुछ पूछा 

ले गए एक दिन मंदिर 

कर दिया मुझे दान

क्या कोई वस्तु मै

जो हो भावनाओं से अंजान।

 

मंदिर ही बन गया घर

 रिश्ते नाते सब पीछे छूटे 

ईश्वर ही आराध्य मेरे 

भक्ति ,समर्पण साधना 

बन गए दोस्त मेरे।

 

नृत्य ,संगीत वाद्य 

सब विधाओं मे पारंगत मै 

बना लिया धीरे-धीरे श्रेष्ठ 

पाओगे मंदिर की दीवारों पर

 आज भी उत्कीर्ण मेरे अवशेष॥


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract