STORYMIRROR

Akanksha Gupta (Vedantika)

Abstract

5  

Akanksha Gupta (Vedantika)

Abstract

मेरी कविता

मेरी कविता

1 min
396

मेरी कविता किसी शिशु की तरह

चाह करती है मेरा स्नेह और ध्यान

क़भी मचलती हैं मेरे अंतस में फिर

खेलने के लिए तब मेरे शब्दों के संग


क़भी मुश्किल हो जाता है मेरे लिए

इसकी निश्छल चंचलता को रोक पाना

तो क़भी मन के विकारों से दूर रखना

तो क़भी इसके साथ सपनों की सैर करना


मुझसे ही जन्मी यह कविता जब कभी

मुस्कुराते हुए बुलाती हैं मुझे अपने पास

तो मेरे पास जाते ही करती है शरारतें

छुप जाती है यही कही शब्दों को लेकर


जब थक जाती हूँ मैं उसे ढूँढते हुए

तो आकर बैठ जाती हैं मेरी गोद में

दे जाती है मुझे शब्द और मेरी कल्पना

का अविरल रूप बन जाती है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract