Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.
Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.

Meera Ramnivas

Abstract


4  

Meera Ramnivas

Abstract


धूप से बड़ी भूख

धूप से बड़ी भूख

1 min 335 1 min 335

जेष्ठ मास की दोपहर,

सूरज उगल रहा है आग, 

हवाओं ने भी

बदल लिया है मिजाज।,

पंछी पेड़ों पर

पशु पेड़ के नीचे 

दुबक गए हैं

मनुष्य घरों में छुप गये हैं ।

रामू मोची,

आग उगलती धूप में,

फुटपाथ पर बैठा है।

कटी फटी छतरी के सहारे, 

धूप संग डटा है,

ग्राहक के इंतजार में

आंखें बिछाये रहता है

बीच बीच में,

टाट के नीचे रखी रेजगारी

गिनता रहता है

शाम के आटे दाल का, 

हिसाब लगाता रहता है।

जब तब पेटी का, 

तकिया बना, सुस्ता लेता है।

गर्मी को भगाने,

गर्म पानी पी लेता है।

रामू को

धूप ताप नहीं सताती है, 

रामू को

परिवार की भूख सताती है।

इसीलिए रामू,

जेठ की दुपहरी सह जाता है। 

जब भी कोई ग्राहक, आता है

रामू के लिये जैसे

ठंडी हवा का झौंका लाता है।  

धूप के ढलने तक

भूख की खातिर

जुटा रहता है

राशन के इंतजार में

परिवार बैठा होता है

दोस्तों !तुम ही कहो, 

धूप बड़ी है, या भूख।

निश्चित ही

धूप से बड़ी है भूख।

    



Rate this content
Log in

More hindi poem from Meera Ramnivas

Similar hindi poem from Abstract