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Amit Kumar

Abstract Tragedy Inspirational

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Amit Kumar

Abstract Tragedy Inspirational

धूल भरी राह....

धूल भरी राह....

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विदा होता हूँ

माफ करना

खताएं सदायें

दुआएं मेरे दिल की

तुम्हें ही ढूंढती थी

हर घड़ी निगाह

मेरे दिल की

तुम्ही को सौंप रहा हूँ

वो नेमतें ज़हमते और

वो तमाम मुहब्बत जो

तुमसे पाई है मेरे पास इनका

न कोई तुम सा 

दूजा सनासाई है

मेरी उलफ़्तों में

ज़िक्र भी तुम्हारा था

फ़िक़्र भी तुम्हारी थी

जो यादें थी धुंधली

जो नग़मे थे अधूरे

जो ख़्वाब थे अधबुने से

जो रेत है सिमटता सा

जो मिठास है भीनी सी

सब तुम्हारा ही व्यवहार था

जिसने बख़्शी थी मेरी

कलम को शब्दों की बूटी

आज वो कलम और वो

तमाम अनकहे शब्द

वापिस लौटा रहा हूँ

विदा हो रहा हूँ

इसीलिए मन से

मेरी खताएं मिटा देना

आंखों को नम करने वाली

वो नमी कहीं किसी

धूल भरी राह में गिरा देना

कोई मैल मत रखना

बस दिल साफ रखना...

हो सके तो मुझे

मुआफ़ करना....

  


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