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Sonam Kewat

Tragedy Classics Inspirational

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Sonam Kewat

Tragedy Classics Inspirational

देवी

देवी

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वो देवी है, ये एक षड्यंत्र है।

तो फिर, क्यों कहा जाता है औरत को देवी?

क्यों नहीं रहने देते उसे इंसानों के रूप में?

देवी कहकर सम्मान के झांसे में रखकर,

वो सोचते हैं कि उसे देवी बना देंगे,

वो हैं भी बेवकूफ जो कभी-कभी इसके झांसे में आ भी जाती है,

फिर वो इंसान नहीं, देवी बनने लगती है।


समाज उसे एक ऐसी देवी बनाता है

जो हमेशा चुप रहना जानती है,

जो त्याग करना जानती है,

जो खुद की ही आवाज दबाती है,

वो खुद को छोड़कर सब कुछ संभालती है,

इस तरह लोगों की नजर में देवी बन जाती है।


मर्दों की नजर में वो तब देवी बनती है

जब औरतें मर्दों के खिलाफ नहीं जाती हैं,

जब मंदिर न जाकर घर को मंदिर बनाती हैं,

जब पति को परमेश्वर बनाती हैं,

जब बच्चों का ख्याल रख पाती हैं,

और जब अकेले घर का सारा भार संभालती हैं,

तब मर्दों की नजर में औरत देवी बन जाती है।


अब आखिरकार, वो ऐसी देवी है

जो सबका ख्याल रखकर खुद को भूल जाती है,

जो लोगों का हिस्सा न होते हुए परिवार बनाती है,

और एक ऐसा भी वक्त आता है कि

वो देवी बनते-बनते इंसान बनना भूल जाती है,

अब वो लोगों की नजर में नहीं,

बल्कि खुद

 की नजर में देवी बन जाती है।



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