छलावा
छलावा
कभी-कभी हम जो सोचते हैं वो सिर्फ एक छलावा होता है,
जहाँ हकीकत सच ना होकर सिर्फ एक वहम होता है,
ये वहम कहीं भी हो सकता है,
परिवार के अपनों में या फिर हमारे सपनों में,
फिर इसी छलावे में जिंदगी का सिलसिला बढ़ते रहता है,
जो झूठ हमने खुद से बोला वह छल होता है
और उस छल को हकीकत समझकर जीना छलावा होता है।
एक वक्त बाद किसी को चाहना भी एक छलावा ही है,
जब पूरी दुनिया तुम्हारी एक शख्स के इर्द-गिर्द घूमने लगे,
जब दिन को खुशी और रात को मदहोशी चुमने लगे,
जब कदम सही और गलत के फैसले से पहले रुकने लगे,
और हकीकत तुम्हें ख्वाबों में जाने से पहले ही टोकने लगे,
जब ख्वाब और हकीकत दोनों एक जैसे ही लगने लगे
तो समझना ये सिर्फ एक छलावा है, सिर्फ छलावा।
ख्वाब छोड़ हकीकत को पहचानना होगा तुम्हें
छल और छलावे का भेद जानना होगा
और जब दिखे ना तुम्हें कुछ छलावा के अलावा,
तो समझना तुम इसकी आखिरी कगार पर हो,
उस वक्त खुद को संभालना होगा,
कसकर हाथ पकड़ना खुद को निकालना होगा
