" चुभा ख़ंजर रहा कोई "
" चुभा ख़ंजर रहा कोई "
पले थे आँख में आँसू, पलक से झर रहा कोई !
व्यथा कितनी समेटे हम, चुभा ख़ंजर रहा कोई !!
जगाई रोशनी दिल में, पढ़ी मन की सभी बातें !
नहीं फिर लौट कर आया, अजी पत्थर रहा कोई !!
सदा रुख देख कर जिसने, हवाओं की दिशा पढ़ ली !
पलटता है नतीजे वो, नहीं तब डर रहा कोई !!
निगाहें लक्ष्य पर रख कर, निशाना जो सिखाता है !
उम्मीदें हैं जगाता नित, सुना रहबर रहा कोई !!
ज़मी खिसकी कभी पैरों, उड़ें हैं होश पल में ही !
ठहरता वक़्त है दोषी, कमी सिर धर रहा कोई !!
किनारे पर खड़े हों जब, लुभाती मौज़ है अकसर !
नज़र पूछे सवालों को, असर घर कर रहा कोई !!
बने सब स्वावलंबी हैं, दरकते हैं "बिरज" रिश्ते !
सभी खम ठोकते मिलते, कहाँ निर्भर रहा कोई !!
