STORYMIRROR

bhagawati vyas

Tragedy

4  

bhagawati vyas

Tragedy

" चुभा ख़ंजर रहा कोई "

" चुभा ख़ंजर रहा कोई "

1 min
641

पले थे आँख में आँसू, पलक से झर रहा कोई !

व्यथा कितनी समेटे हम, चुभा ख़ंजर रहा कोई !!


जगाई रोशनी दिल में, पढ़ी मन की सभी बातें !

नहीं फिर लौट कर आया, अजी पत्थर रहा कोई !!


सदा रुख देख कर जिसने, हवाओं की दिशा पढ़ ली !

पलटता है नतीजे वो, नहीं तब डर रहा कोई !!


निगाहें लक्ष्य पर रख कर, निशाना जो सिखाता है !

उम्मीदें हैं जगाता नित, सुना रहबर रहा कोई !!


ज़मी खिसकी कभी पैरों, उड़ें हैं होश पल में ही !

ठहरता वक़्त है दोषी, कमी सिर धर रहा कोई !!


किनारे पर खड़े हों जब, लुभाती मौज़ है अकसर !

नज़र पूछे सवालों को, असर घर कर रहा कोई !!


बने सब स्वावलंबी हैं, दरकते हैं "बिरज" रिश्ते !

सभी खम ठोकते मिलते, कहाँ निर्भर रहा कोई !!



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy