चार कान्धे
चार कान्धे
चार कान्धे मिलने की उम्मीद में, हम जगत को प्रेम से जोड़ते चले गए,
जिनसे कभी मन-मुटाव था हमारा, उनको भी अपनी ओर मोड़ते चले गए।
क्या रखा है इस जगत में मैल मन में पाल के ?
क्यूँ चले हम अगले जन्म में एक उधारी माँग के ?
गर ये चार कान्धे भी ना मिले तो क्या हमने कमाया है ?
इस मनुष्य जीवन को यूँ व्यर्थ ही गँवाया है।
चार कान्धे मिलने की उम्मीद में, हम जगत को प्रेम से जोड़ते चले गए।
चार कान्धों का महत्व हमने उसी दिन सीख लिया,
जब कोरोना काल में अपनो के ही शवों को छोड़ दिया,
फिर से कभी ना वो भयंकर काल यहाँ दुबारा आये,
जब अपनो ने ही अपनो के दिलों पर जी भर कर खंजर चलाये।
चार कान्धे मिलने की उम्मीद में, हम जगत को प्रेम से जोड़ते चले गए।
कहने को तो ये चार कान्धे लगते बड़े सस्ते हमें,
पर जिन्हे मिलते नहीं उनके होते नसीब सबसे बुरे,
जब दबी आवाज़ में महफ़िल कहे उसे बेचारा,
जो चार कान्धे भी ना पा सका उसका जीवन ऐसे क्यूँ हारा ?
