बयान-ए-दर्द
बयान-ए-दर्द
उलझी हुई सी हूं मैं,
सुलझ ना पा रहीं हूं
सीने मैं एक दर्द को कफ़न के साथ ले जा रहीं हूं ।
पूछते हैं सारे आज कल मुझसे
कैसी चल रहीं है जिंदगी,
उनको कुछ बता ना पा रहीं हूं,
तन्हाई की तकलीफ किसी को ना जता पा रहीं हूं।
दर्द है ही कुछ ऐसा की किसी को ना बता पा रहीं हूं,
दर्द है ही कुछ ऐसा की किसी को ना बता पा रहीं हूं।
लगता है जीने की चाह छोड़ जा रहीं हूं।
मुस्कुराना भूल गयी हूं गुनगुनाना छोड़ दिया है ,
मुस्कुराना भूल गयी हूं गुनगुनाना छोड़ दिया है
लगता है खुशियों ने मुझसे मुख मोड़ लिया है।
मुकद्दर के इस खेल में मैं खुद को ना सम्भाल पा रहीं हूं
गम सिर्फ एक नहीं है,
गम तो अनेक है
लेकिन इस नए ज़ख्म को ना मिटा पा रहीं हूं ।
चेहरा है शांत आंखे है नम
क्यूंकि ये गम नहीं है किसी से कम
दर्द तो पहले भी मिलते थे उनसे ना डरती थी मैं,
हर हालात से लड़ती थी मैं,
लेकिन ये वाला है कुछ अलग
कुछ नया
इसको ना सम्भाल पा रहीं हूं।
नहीं बता सकती किसी को
क्यूंकि कोई समझ ना पाएगा,
ये दुख मेरे साथ कयामत तक जाएगा
ये दुख मेरे साथ कयामत तक जाएगा।
पूछना है खुदा से बस एक सवाल
ऐसा कौन सा किया है मैंने बवाल,
ना किसी का बुरा सोचा
ना किया किसी के साथ गलत
तो फिर क्यूँ है मेरी ऐसी हालत।
सब कुछ तो तुझे देने के लिये तैयार थी मैं
अपने आप को मिटाने को तैयार थी मैं,
फिर क्यूँ गम बड़ा दिया तूने कुछ इस कदर
की मच गया है मेरे दिल और दिमाग में ग़दर ।
हस्ती तो मैं पहले भी कम थी,
बस बकवास थोड़ा जयदा करती थी ।
हस्ती तो मैं पहले भी कम थी,
बस बकवास थोड़ा जयदा करती थी।
लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है ना,
मेरी खुशियां भी बहुत कम थी।
हालात बदलते है जज़्बात बदलते है,
हालात बदलते हैं जज़्बात बदलते हैं
लेकिन मेरी खुशियो के तो रास्ते ही बदल जाते हैं।
इस दर्द के साथ जीना हो गया है मुश्किल मेरा
क्या यहि है फ़र्ज़ तेरा,
नहीं रखना है मुझे कर्ज ये तेरा,
तो सुन ले तू मेरी ये बात
मौत के साथ करवा दे मेरी मुलाकात
मौत के साथ करवा दे मेरी मुलाकात।
