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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

"बोझ"

"बोझ"

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यह जिंदगी, तब लगने लगी, मुझे बोझ

जब फूलों ने ही दे दी, पत्थर को चोट

आंखों में आंसुओं की हुई नहीं खोज

जब शूलों की चुभन हो गई थी, बहुत

लहू ने भी खोया है, आज अपना ओज

पाकर अपने ही खून के भीतर लोच

अब मैंने तो सील लिये है, अपने होंठ

बाहर से मीठे, भीतर जो रखते है, खोट

बक शर्मिंदा देख हमारी हरकतें रोज

नदियां प्यासी, उसमें गंदगी हुई, बहुत

बाह्य सजाते तन, घट पाप छिपा बहुत

स्वार्थ खातिर, अपने ही रहे गला घोंट

खुद के साये, आज रहे खुद को नोच

आज खुद के साये भी हुए, जमींदोज

जब देखी भीतर, सच आईने की तोप

पर जिसने सच सजाई की झांकी रोज

वही व्यक्ति एक दिन बनता है, अखरोट

जिसका जिंदा ईमान, जिंदा सत्य सोच

वो पत्थरों को बना देता है, एक दिन मोम

उनकी है, मौज जिनके भीतर न झूठ बोझ



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