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बंद लिफाफा

बंद लिफाफा

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बंद लिफाफों की वह हवायें,

न जाने कहाँ गुम हो गई,

जो इंतज़ार कराती थी,

किसी के हाथों की खुशबुओं का !


किसी के दिल के उमंगों का,

किसी की आँखों में नमी भी झलकती थी,

तो किसी के दिल का गुबार भी,

नज़र आता था स्याही में !


वह साइकिल के पहियों की,

जानी पहचानी आवाज़ का इंतज़ार,

वह गलियों के नुक्कड़ तक

उन आंखों का इंतज़ार !


न जाने ऐसा क्या होता था,

उस कागज़ के टुकड़े में,

माँ गले से लगाती थी,

बाप चूमता रहता था !


बहन भाई की आँखों की,

चमक गहरी हो जाती थी,

वह कागज़ का टुकड़ा हाथों के,

झूलों में झूलता रहता था !


कहीं कहीं, दूर कोने में,

बैठी दो आँखें चमकती रहती थी,

दो मोती आँचल को गीला कर देती थी,

दिल उसका भी धड़कता था,

वह बेइंतहा इंतज़ार का,

ग़म कुछ कम हो जाता था !


आज का दौर शिद्दत खो बैठा है,

मोहब्बत कहीं परदों के पीछे गुम हो गई है,

इंतज़ार का लुत्फ़ कहीं लुप्त हो चुका है,

बेकरारी नशे में झूल रही है !


रातों की रोशनियों में,

दिन की रवाईयाँ दिखने लगी है,

इंतज़ार हर नुक्कड़ पर नाच रहा है,

वह कागज़ का टुकड़ा अब,

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो गया है !


दूरियाँ बदस्तूर वहीं खड़ी है,

पर एहसास घट गया है,

इंसान का इंसान पर से,

विश्वास हट गया है !


एक लफ्ज़ जो कद से,

आगे बढ़ गया है,

वह "मैं-मैं" हर इंसान की,

ज़ुबान पर रट गया है !


याद आता है जब,

मंज़र बंद लिफाफे का,

दिल ज़रा-ज़रा हो जाता है,

आज के दौर से हट सकते नहीं !


रिश्तों को समेटना,

एक ख्वाब-सा लगता है,

पर एक कोशिश तो कर ऐ बन्दे,

अंदर के इंसान को जगा !


वह बंद लिफाफों की,

हवाएँ लुप्त नहीं हुई है,

बस महसूस करने में,

आजकल थोड़ा वक्त ज़्यादा लगता है !


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