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Ratna Kaul Bhardwaj

Classics Inspirational

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Ratna Kaul Bhardwaj

Classics Inspirational

गिर रहा है इंसान

गिर रहा है इंसान

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गिर रहा है इंसान गिर रहा है "इंसान"
 गिरता ही जा रहा है और गिरेगा,
गिरता ही जाएगा क्योंकि
गिरना नया शिष्टाचार बना है।
 शर्म ओ हया का पर्दा
 उसने चीर दिया है,
 ज़मीर की आखिरी सीढ़ी से
 कदम हटा दिये हैं उसने,
 आइने से नज़रे चुराने का हुनर
बखूबी सीखा है।

 ए इंसान! तू गिर गया है
 अहंकार की धूल में घुल गया है
 और गिर गया है;
 सत्य को नीलाम किया
 और गिर गया,
 तालियों का मोहताज हुआ
 और गिर गया,
 सबको अपना गुलाम बनाया
 और गिर गया,
 छल किया, चरित्र बेच दिया
 और गिर गया,
 लोगों की आंखों में धूल झोंकी
 और गिर गया,
 सफेद लिबास में काली सीरतें ,
 नीयतों पर जमी कालिख लेकर घूमा
 और गिर गया।


 तू कितना गिरेगा और
कब तक गिरेगा,
 तेरे गिरने की कोई हद तो होगी!
 अरे जिस दिन से तू स्वार्थ पूजने लगा,
 उसी दिन से ही तू गिर गया;
 उस पतन को अपनी प्रगति का नाम न दे।
 छल, चतुराई से सभ्यताएँ बनती नहीं;
 अरे अंधेरा भी प्रकाश के आगे झुकता है
 और तूने सूरज को काली चादर के पीछे
 छुपाने की साजिश ठानी है।
 

याद रख!
 अगर अपने अंदर के सोए हुए ज़मीर को
जगाओगे नहीं,
 एक दिन नियति खेल खेलेगी
 तू इतना गिरेगा कि
धरती भी कबूल न करेगी।
 आज सभ्यता, इंसानियत लहूलुहान है,
वक़्त है "तू उठ!"
 उठ! अपने भीतर झांक,
 तेरी आत्मा जो अंधेरे में कैद है,
 उससे झंझोड़ कर जगा,
 अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ा,
 हृदय में करुणा ला,
 औरों को सपने देखने व
 उन्हें उजागर करने का हौसला दे,
 उनकी उमीदों को मत ललकार।

 आने वाली पीढ़ियों के लिए
 उलझे सवाल न छोड़
 क्योंकि भविष्य विरासत से नहीं बनता,
 वह बनता है तो "हर पीढ़ी के चरित्र से"..... ✍️

रतना कौल भारद्वाज


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