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Suresh Sachan Patel

Thriller

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Suresh Sachan Patel

Thriller

।।भूख और गरीबी।।

।।भूख और गरीबी।।

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पेट में जब भूख किसी को सताती।

सूखी रोटी भी बहुत उसको भाती है।

भूख से जब कोई बिलख रहा होता,

ब्रेड का टुकड़ा जनता भूखी खाती है।


गुरबत का मै मारा हूॅ॑ मुझे भीख चाहिए।

आए न मुसीबत किसी पर ये सीख चाहिए।

 जो भूख का मारा हो वह क्या नहीं करता,

भूख की दुनिया में न अब चीख चाहिए।


मजलूम के फैले हुए हाथों को देखिए।

कैसा बुरा हाल है गरीबों को देखिए।

कुछ तो बढ़ाओ हाथ मदद को उनकी भी,

हमदर्दी गरीबों को भी थोड़ी आज चाहिए।


मजबूर हो कर भीख मैं माॅ॑ग रहा हूॅ॑।

मजबूरियों में हाथों को फैला रहा हूॅ॑।

किसी को न मिले यह गरीबी जहान में,

गलियों की ठोकरों को मैं खा रहा हूॅ॑।


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