ज़ंजीरों को तोड़ -तोड़
ज़ंजीरों को तोड़ -तोड़
साधारण हैं तो क्या हुआ,
खुद को आज़माने हम भी रण में जाएंगे।
देख लेंगे दुश्मन के बाजुबल को पर,
इन ज़ंजीरों को तोड़-तोड़,
हम भी आज़ादी पाऐंगेI
नहीं बाँध सकतीं ये नकली ज़ंजीरें,
मेरे मनोबल को,
ये तुम समझ लेना
महल के शहजादों।
अब तो चाहे जल जाए
मेरा यह मिट्टी बदन,
न रुकेगी यह ज्वाला,
चाहे मुझे ज़हर भी पिलादो।
