ईबादत
ईबादत
संदेह मिट रहा है
सानिध्य जुड़ रहा है
कुछ खाक़् है
कुछ पाक़् है
नहीं जानता जमाना
कौन किसकी ताक़् मे है
वक़्त की बिसात पर
बिछी है ज़िंदगी
कौन जानता है
क्या किसके हाथ है
इबादतों का बस इक
यही सिलसिला है
मुस्कुराकर जो देख ले
दिलोजान उसके साथ है।

