Aditya chandra 'Subhash'
Romance
ये मेघ इतना बरस क्यों रहें हैं
क्यों इनकी गर्जन में इतना दर्द है
क्यों ये दामिनी इतना चमक रहीं हैं
लगता है जैसें फिर किसी ने
सपने सजा कर हजारों,
आपना दामन छुड़ा लिया।
माँ की पात्रत...
सतत् विकास
मेघ
उन्मुक्त हूँ ...
खोज स्वयं की
मोमबत्ती
तारा
पांवों की सुन्दरता में पाजेब चार_चांद लगा देती है, किसी भी कोमल काया को अप्सरा बना देती है पांवों की सुन्दरता में पाजेब चार_चांद लगा देती है, किसी भी कोमल काया को अप्सरा ...
फिर अपने-अपने घर जायेंगे. ये मोहब्बत नहीं बस अश्लीलता का खेल है। फिर अपने-अपने घर जायेंगे. ये मोहब्बत नहीं बस अश्लीलता का खेल है।
ठंडी ठंडी पुर्वैया ने सब के चहेरे पर रोनक लाई। ठंडी ठंडी पुर्वैया ने सब के चहेरे पर रोनक लाई।
मंगल मय यात्रा की कामना, दिल लिए निकल पड़ता हूं। मंगल मय यात्रा की कामना, दिल लिए निकल पड़ता हूं।
ज़िन्दगी की इस यात्रा में भी कुछ अलग ही बात होती है। ज़िन्दगी की इस यात्रा में भी कुछ अलग ही बात होती है।
मुझे अपनी तस्वीर खींचनी है तुम्हारी आंखों से। मुझे अपनी तस्वीर खींचनी है तुम्हारी आंखों से।
मुझे हर मौसम भाता है, जहाँ तुम साथ हो। मुझे हर मौसम भाता है, जहाँ तुम साथ हो।
इन दूरियों को यूँ ही निढाल करती रहना ज़िन्दगी है जब तक कमाल करती रहना.... इन दूरियों को यूँ ही निढाल करती रहना ज़िन्दगी है जब तक कमाल करती रहना....
आँखें उसकी झील सी गहरी जिनमें मैंने खुद को डूबता देखा !! आँखें उसकी झील सी गहरी जिनमें मैंने खुद को डूबता देखा !!
मेरी आंखों के सामने उजड़ रही है दुनिया मेरी। मेरी आंखों के सामने उजड़ रही है दुनिया मेरी।
यूँ न तुमसे कभी दिल की कह पाउँगा, पर मैं रख लूँगा दिल से तुम्हें जोड़ कर। यूँ न तुमसे कभी दिल की कह पाउँगा, पर मैं रख लूँगा दिल से तुम्हें जोड़ कर।
दिल की नजर से कहीं भी देखो तो उसका चेहरा ही नूर बरसाता दिखता है दिल की नजर से कहीं भी देखो तो उसका चेहरा ही नूर बरसाता दिखता है
जब ग़ैरों से धोखा खाया तो अपनो के पास ही वापस आया हमने भी अपना समझ आज उसे सीने से ल जब ग़ैरों से धोखा खाया तो अपनो के पास ही वापस आया हमने भी अपना समझ आज ...
कुछ अपनी सुनाना कुछ हम अपनी सुनायेंगे जिंदगी की उलझनें साथ मिलकर सुलझाएंगे। कुछ अपनी सुनाना कुछ हम अपनी सुनायेंगे जिंदगी की उलझनें साथ मिलकर सुलझाएंगे।
उस नजर से आईने में उभरे अक्श का मैं रोज श्रृंगार करती हूं। उस नजर से आईने में उभरे अक्श का मैं रोज श्रृंगार करती हूं।
कन्हैया खेलत हैं होली बृज में गोपियों के संग। कन्हैया खेलत हैं होली बृज में गोपियों के संग।
हाँ...! मिलेंगे हम मेरे जीवन के अंतिम पड़ाव पर. हाँ...! मिलेंगे हम मेरे जीवन के अंतिम पड़ाव पर.
कौन हो तुम ? तुम्हारे आने की आहट से पत्तों में सरसराहट सी आती है। कौन हो तुम ? तुम्हारे आने की आहट से पत्तों में सरसराहट सी आती है।
साथ जीना जग नामी हर घर चर्चा है, यार अब धन सब पर सतत उड़ाएं कैसे। साथ जीना जग नामी हर घर चर्चा है, यार अब धन सब पर सतत उड़ाएं कैसे।