STORYMIRROR

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Tragedy

4  

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Tragedy

बेरोजगार और भिखारी

बेरोजगार और भिखारी

1 min
273

मैं ढूंढता हूँ रोटी

टूटे भिखारी सा

लेकिन

वह कूड़े की ढेर में और

मैं अखबार के पन्नो में

दोनों चलते हाथ फैलाये

वह टोकरी लिए

मैं डिग्री लिए

फिर भी

मैं बेरोजगार हूँ  भिखारी नहीं

रोटी चाहिए मुझे कृपादृष्टि नही

बदले में मेहनत दूंगा स्वाभिमान नहीं

कष्ट सहूँगा अपमान नहीं

राष्ट्र की जरूरत हूँ मैं

अर्थहीन जमात नहीं

जातिगत राजनीति तेरी

समाधान नही, समस्या है मेरी

बदलना होगा इस व्य्वस्था को

जिसमे भविष्य की आस्था नही ।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy