STORYMIRROR

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract

4  

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract

!!चलते रहो!!

!!चलते रहो!!

1 min
339

हिसाब हर कोई यही लगाता

अच्छा होता, और मिल जाता 

सोंच बदलो दुनिया बदलेगी

मिला क्या, का छोड़ विचार


दिया क्या, का कर विचार

जन्म दिया माँ- बाप ने

पहचान दिया परिवार ने

जीविका दिया समाज ने


साधन दिया संसार ने

स्व का भान कर

कुछ पर उपकार कर

अपना भी दान कर

मानकर, जानकर


गिनती की सांसें, अनगिनत उम्मीदें

उलझनें अनजान, संसाधन बंधन

योग कर, सहयोग कर,प्रयोग कर

होगा,अवरोध विरोध निषेध


रुकना नहीं, झुकना नहीं, हिचकना नहीं

उद्यम तुम्हारा हो संयोग सहारा हो

कर स्वदान बदल आत्मपरिधान  

धनदान, ज्ञानदान, रक्तदान,वक्तदान

अनंत यात्रा के इस ठहराव में 

कारक बन सही बदलाव में


जो दिया वही अपना

जो लिया उधार बना

दान कर अमीर बन

करते रहो! चलते रहो !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract