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Madhu Vashishta

Tragedy

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Madhu Vashishta

Tragedy

बेजुबान पर्वत

बेजुबान पर्वत

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बेजुबान पर्वत भी बोलते हैं

लेकिन हम उनकी भाषा ही कहां समझते हैं।

अब हम बिना सोचे समझे काटते हैं वृक्ष।

पहुंचाते हैं पर्यावरण को नुकसान।

रो उठता है पर्वतों का मन

और हो जाता है भू-स्खलन।

पर्वतों में पेड़ों की जड़ें रहती है बहुत गहरी।

बसा हुआ है संसार उनका जमीन के नीचे।

उनकी जड़े ही हैं ऊपर से पेड़ों की प्रहरी।

जमीन के नीचे दूर-दूर तक फैली जड़े एक दूसरे को अपनी व्यथा सुनाती है।

वृक्षों को बढ़ाती हैं और पहाड़ों को सजाती है।

बहुत से दोस्त हैं पहाड़ों के यह छोटे बड़े जानवर भी।

ठंडी ठंडी जब चलती है हवा

 हिला हिला के हाथ,

लेकर हवा से आवाज।

पर्वत हमेशा करते हैं आपस में बातें भी।

प्राणी मात्र की सेवा में यह सदा ही तत्पर रहते हैं।

रोग मुक्त हो जाए जन जीवन

इसलिए फल फूल के साथ

यह जड़ी बूटियां भी उगाते हैं।

हे मानव क्यों उगा रहे हो कंक्रीट के जंगल,

पर्वत अब तुमसे बोलते हैं।

तुम ऊपर से काटते हो वृक्षों को

वह नीचे से डोलते हैं।


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