बातें करते हुए ज़िंदगी से
बातें करते हुए ज़िंदगी से
बातें करते हुए, ज़िन्दगी से, ज़िन्दगी की
शायद, ये ज़िन्दगी जीना हम सीख जाएं।
कुछ पल बिताकर, खामोशी की पनाह में
शायद खुद को सुन सकें और समझ पाएँ।
ख्वाहिशों की जमीं पे, दौड़ती ज़िंदगी को
थोड़ी सुकून-ए-हवा, थोड़ा विराम दे पाएँ।
ऐ ज़िन्दगी! चल आहिस्ता-आहिस्ता कुछ पल साथ
उलझे हैं कुछ सवाल शायद उनका जवाब मिल जाए।
बिखर गए हैं, कुछ पन्ने, ज़िन्दगी की भागा दौड़ी में
तेरी पनाह में, बिखरे पन्नों की वो किताब मिल जाए।
कुछ कही, अनकही ख्वाहिशों की, पटरियों के बीच
दबे हुए हैं जो ख़्वाब, थोड़ी उनको उड़ान मिल जाए।
फुरसत के कुछ पल, बीत जाए जो ज़िंदगी के साथ
किरदारों से हटकर खुद की एक पहचान मिल जाए।
खुद की आवाज़ सुन, खुद की रूह से रूबरू होकर
थामकर खुद का हाथ दिल से दिल की बात हो जाए।
जी लेने दे जी भर ऐ ज़िन्दगी, कुछ पल तेरे साथ भी
जाने कौन सा पल ज़िंदगी का, आखरी पल हो जाए।
सही वक्त के इंतजार में वो वक्त कभी आया ही नहीं,
ज़िंदगी तू गले तो लगा एक बार, कहीं देर न हो जाए।
गुज़र चुका ज़िंदगी का आधा सफ़र, इसी इंतज़ार में
खुद को जानने की कसक, कहीं दिल में ही रह जाए।
