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AVINASH KUMAR

Romance

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AVINASH KUMAR

Romance

बार बार कहा तुमने

बार बार कहा तुमने

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बार बार कहा तुमने

हर बार कहा तुमने

मैं लकीर हूं तुम्हारे हाथों की

जिंदगी से तुम्हारे न जाऊंगी 


बार बार माना मैंने

हर बार माना मैंने

किस्मत तुम्हें मान लिया

मुट्ठी में बांध लिया


नाज़ था मुझे अपनी किस्मत पे

यकीन था बहुत तेरी मुहब्बत पे

मुट्ठी भिंच मैं तन्हा चलता रहा 

तन्हा नहीं मैं यही समझता रहा 


आये सफर में ऐसे भी मोड़ कई

लगा तू साथ है भी या नहीं

हथेली में तुझे टटोलने लगा 

बंद मुट्ठी मैं खोलने लगा 


मेरे सवालों से रुठ गयी तुम

यूं लगा कि मुट्ठी से रीस गयी तुम

न खोलना मुट्ठी फिर चेताया तुमने

साथ ही तो हूं फिर जताया तुमने


कुछ दिन वहम और टिका

कुछ उम्र सफ़र और कटा

मुट्ठी में थी कोई हलचल नहीं

तेरे साथ की गरमाहट नहीं


घबराकर इक दिन आवाज़ दी

मुट्ठी में गूंज खामोशी की थी

दूर खड़े देखा तुम्हें 

तो खोल मुट्ठी ढूंढा तुम्हें


हथेली मेरी खाली ही थी

लकीरों में न तू न तेरी मुहब्बत ही थी

सूनी हथेली दिखा तुम्हें

मैं तुम्हारी ओर देखने लगा 


बेगानों से ज्यादा अजनबी लगी तुम

मुझसे ही फिर खफा लगी तुम

क्यूं खोली मुट्ठी कहने लगी 

गलत ठहरा मुझे छोड़ने लगी 


तुम्हारी पीठ पे उगी दीवार पे

सिर मैं देर तक पटकता रहा 

तुम्हारी पथरीली जिद पे

मैं अना अपनी तोड़ता रहा 


बिखरे टुकड़े समेट कर अपने

मैं फिर खुद को जोड़ने लगा 

तुम्हारी हूं मैं फिर कहा तुमने 

फिर माना मैंने पर मुट्ठी बांधी नहीं



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